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लेसिक सर्जरी असफल होने के 5 मुख्य कारण
क्या LASIK सर्जरी फेल हो सकती है? इस लेख में जानिए लेसिक सर्जरी असफल होने के 5 मुख्य कारण, जैसे गलत मरीज का चयन, अंडर-करेक्शन, ओवर-करेक्शन, कॉर्नियल एक्टीशिया और अन्य संभावित जोखिमों की पूरी जानकारी
लेसिक का मतलब सिर्फ लेजर से चश्मा हटाना नहीं है, बल्कि यह एक सटीक गणितीय और मेडिकल प्रक्रिया है। जब इस प्रक्रिया में कहीं कोई कमी रह जाती है, तो सर्जरी फेल मानी जाती है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
1. गलत मरीज का चयन (Poor Candidate Selection)
लेसिक की असफलता का सबसे बड़ा कारण है बिना पूरी जांच के किसी को सर्जरी के लिए चुन लेना। यदि किसी मरीज का कॉर्निया बहुत पतला है, कॉर्निया का आकार अनियमित है, या उसे केराटोकोनस (Keratoconus) जैसी बीमारी की शुरुआती स्टेज है, तो ऐसी स्थिति में लेसिक नहीं की जानी चाहिए। यदि फिर भी सर्जरी कर दी जाए, तो बाद में दृष्टि धुंधली हो सकती है।
2. अंडर-करेक्शन और ओवर-करेक्शन (Under-Correction & Over-Correction)
अंडर करेक्शन (Under-Correction): जब लेजर कॉर्निया से पर्याप्त मात्रा में टिशू नहीं हटा पाता, तो चश्मे का कुछ नंबर (+ या -) बाकी रह जाता है। यह अक्सर बहुत हाई पावर वाले मरीजों में देखने को मिलता है।
ओवर करेक्शन (Over-Correction): जब लेजर जरूरत से ज्यादा कॉर्नियल टिशू को हटा देता है, तो मायोपिया (निकट दृष्टि) का मरीज हाइपरोपिया (दूर दृष्टि) का शिकार हो जाता है।
इन दोनों ही स्थितियों में मरीज को स्पष्ट दिखाई नहीं देता और कभी-कभी रीट्रीटमेंट (Re-treatment / Enhancement) की आवश्यकता पड़ती है।
3. कॉर्नियल एक्टीशिया (Corneal Ectasia)
यह लेसिक का एक बहुत ही दुर्लभ लेकिन गंभीर साइड इफेक्ट है। यदि लेसिक के दौरान कॉर्निया के अंदरूनी हिस्से से बहुत ज्यादा टिशू हटा दिया जाए, तो कॉर्निया का बचा हुआ हिस्सा कमजोर हो जाता है। समय के साथ आंखों के अंदरूनी दबाव (IOP) के कारण कॉर्निया बाहर की तरफ उभरने लगता है। इससे मरीज की दृष्टि काफी धुंधली और विकृत हो जाती है।
4. सर्जिकल फ्लैप से जुड़ी जटिलताएं (Flap Complications)
लेसिक सर्जरी में कॉर्निया पर एक पतला फ्लैप (Flap) बनाया जाता है। अगर यह फ्लैप बनाते समय या वापस रखते समय सही ढंग से सेट न हो, तो निम्नलिखित समस्याएं हो सकती हैं:
फ्लैप रिंकल्स (Flap Wrinkles): फ्लैप पर सिलवटें आ जाना, जिससे धुंधला दिखाई देता है।
इ Epithelial Ingrowth: आंख की बाहरी त्वचा की कोशिकाएं फ्लैप के नीचे उगने लगती हैं।
डिस्प्लेसमेंट: सर्जरी के तुरंत बाद आंख को जोर से रगड़ने पर फ्लैप का अपनी जगह से हिल जाना।
5. अत्यधिक ड्राई आई (Severe Dry Eye)
सर्जरी के दौरान कॉर्निया की कुछ बारीक नसें कट जाती हैं, जिससे आंसुओं का बनना अस्थायी रूप से कम हो जाता है। अधिकांश मरीजों में यह 3 से 6 महीने में ठीक हो जाता है। लेकिन अगर किसी मरीज की ड्राई आई (Dry Eye) की समस्या स्थायी हो जाए, तो आंखों में लगातार चुभन, रेडनेस और धुंधलापन बना रहता है।
लेसिक के बाद नंबर वापस क्यों आता है? (Regression)
कई मरीज शिकायत करते हैं कि लेसिक कराने के 3 या 5 साल बाद उनका चश्मे का नंबर दोबारा आ गया। इसे मेडिकल भाषा में रिग्रेशन (Regression) कहा जाता है। लेसिक सर्जरी के बाद नंबर वापस आने के पीछे मुख्य रूप से दो कारण होते हैं:
अस्थिर चश्मे का नंबर (Unstable Power): यदि आपकी आंख का नंबर स्थिर नहीं था और आपने 18-19 साल की उम्र में जल्दबाजी में सर्जरी करा ली, तो उम्र बढ़ने के साथ आंख की शारीरिक बनावट बदलती है और नंबर वापस आ सकता है।
नेचुरल हीलिंग प्रोसेस: कुछ मामलों में हमारी आंखें सर्जरी के बाद अपने कॉर्नियल टिशू को प्राकृतिक रूप से दोबारा री-ग्रो (Regrow) करने की कोशिश करती हैं, जिससे हल्का सा नंबर वापस आ सकता है।
लेसिक के संभावित साइड इफेक्ट्स और रिस्क (Risks & Side Effects)
लेसिक के बाद कुछ सामान्य साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं जो आमतौर पर समय के साथ ठीक हो जाते हैं:
ग्लेयर्स और हेलो (Glares & Halos): रात के समय गाड़ियों की हेडलाइट्स या लाइटों के चारों ओर छल्ले दिखना।
दोहरा दिखाई देना (Double Vision): एक ही चीज की दो-दो छवियां दिखना।
लाइट सेंसिटिविटी: तेज धूप या स्क्रीन की रोशनी से परेशानी होना।
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