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बच्चों को लेसिक सर्जरी हो सकती है क्या?
बच्चों को लेसिक सर्जरी हो सकती है क्या?25 May 2026

बच्चों को लेसिक सर्जरी हो सकती है क्या?

बच्चों में लेसिक सर्जरी कब की जा सकती है, किन परिस्थितियों में इसकी सलाह दी जाती है और विशेषज्ञ क्या कहते हैं, जानें।

यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। बच्चों की आंखों से जुड़ा कोई भी निर्णय लेने से पहले योग्य नेत्र विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

जब किसी बच्चे का चश्मे का नंबर बार-बार बढ़ने लगता है, तो माता-पिता स्वाभाविक रूप से चिंता करने लगते हैं। कुछ बच्चों को कम उम्र में ही मोटा चश्मा लग जाता है। स्कूल, खेलकूद और रोजमर्रा की गतिविधियों में उन्हें परेशानी होने लगती है। ऐसे में कई माता-पिता यह सोचने लगते हैं कि क्या लेसिक सर्जरी करवा कर बच्चे का चश्मा हटाया जा सकता है।

आजकल इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों पर आंखों की लेजर सर्जरी के बारे में काफी जानकारी दिखाई देती है। इसी वजह से लोग जल्दी समाधान खोजने लगते हैं। लेकिन बच्चों के मामले में स्थिति वयस्कों से अलग होती है।

आमतौर पर कम उम्र के बच्चों में लेसिक सर्जरी की सलाह नहीं दी जाती। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि बच्चों की आंखें अभी विकसित हो रही होती हैं और उनका नंबर स्थिर नहीं होता।

बच्चों में लेसिक सर्जरी सामान्यतः क्यों नहीं की जाती?

बच्चों की आंखों में लगातार बदलाव होते रहते हैं। कई बार एक या दो साल के भीतर ही चश्मे का नंबर बदल जाता है।

यदि ऐसी स्थिति में सर्जरी कर दी जाए, तो भविष्य में दृष्टि फिर बदल सकती है। यही कारण है कि डॉक्टर पहले यह देखना चाहते हैं कि आंखों का नंबर लंबे समय तक स्थिर है या नहीं।

इसके अलावा बच्चों की आंखें अभी पूरी तरह विकसित नहीं होतीं। ऐसे में सर्जरी के लंबे समय के परिणामों को लेकर अतिरिक्त सावधानी रखी जाती है।

लेसिक के लिए उम्र क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है?

उम्र केवल एक संख्या नहीं होती। आंखों के विकास से इसका सीधा संबंध होता है।

सामान्यतः 18 वर्ष के बाद आंखों का नंबर अपेक्षाकृत स्थिर होने लगता है। इसी कारण अधिकतर डॉक्टर इस उम्र के बाद ही ऐसी प्रक्रियाओं पर विचार करते हैं।

हालांकि केवल उम्र पूरी होना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। कई बार 18 वर्ष के बाद भी नंबर बदलता रहता है। इसलिए डॉक्टर पिछले कुछ वर्षों का चश्मे का रिकॉर्ड भी देखते हैं।

क्या बच्चों में बढ़ता हुआ नंबर सामान्य है?

हाँ, कई बच्चों में बढ़ती उम्र के साथ नंबर बदलता रहता है।

आजकल लंबे समय तक मोबाइल, कंप्यूटर और घर के भीतर रहने की आदतें भी आंखों को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि हर बच्चे में कारण अलग हो सकते हैं।

कुछ बच्चों में:

  • दूर की चीजें धुंधली दिखाई देने लगती हैं

  • स्कूल में बोर्ड पढ़ने में परेशानी होती है

  • सिरदर्द की शिकायत होती है

  • आंखें जल्दी थक जाती हैं

ऐसी स्थितियों में आंखों की जांच जरूरी मानी जाती है।

यदि बच्चे को चश्मा पसंद न हो तो क्या करें?

बहुत से बच्चे चश्मा पहनने में असहज महसूस करते हैं। कुछ बच्चे स्कूल में मजाक बनने के डर से चश्मा पहनने से बचते हैं। कुछ खेलते समय बार-बार चश्मा टूटने से परेशान हो जाते हैं।

ऐसी स्थिति में माता-पिता जल्दबाजी में सर्जरी के बारे में सोचने लगते हैं। लेकिन केवल असुविधा के कारण कम उम्र में सर्जरी करवाना सही निर्णय नहीं माना जाता।

बच्चों को धीरे-धीरे चश्मा पहनने की आदत डालना और उन्हें मानसिक रूप से सहज महसूस कराना अधिक जरूरी होता है।

बच्चों के लिए कौन से विकल्प उपलब्ध होते हैं?

यदि बच्चे की दृष्टि कमजोर है, तो सामान्यतः ये विकल्प उपयोग किए जाते हैं:

चश्मा

यह सबसे सुरक्षित और सामान्य तरीका माना जाता है। सही नंबर का चश्मा बच्चे की पढ़ाई और रोजमर्रा के कामों में मदद करता है।

लेंस

कुछ बड़े बच्चों या किशोरों में डॉक्टर की सलाह से लेंस का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन इसमें सफाई और देखभाल बहुत महत्वपूर्ण होती है।

नियमित आंखों की जांच

बढ़ती उम्र में समय-समय पर आंखों की जांच करवाना जरूरी माना जाता है ताकि नंबर में बदलाव का पता चलता रहे।

क्या कभी बच्चों में लेसिक की जा सकती है?

कुछ बहुत विशेष परिस्थितियों में डॉक्टर अलग तरीके से सोच सकते हैं, लेकिन यह सामान्य स्थिति नहीं मानी जाती।

ऐसे मामलों में निर्णय बहुत सावधानी से लिया जाता है और विस्तृत जांच की जाती है। इसलिए इंटरनेट पर पढ़ी हुई जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकालना सही नहीं होता।

क्या मोबाइल और स्क्रीन बच्चों की आंखों को प्रभावित करते हैं?

लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में थकान और सूखापन महसूस हो सकता है। कई बच्चे घंटों मोबाइल या कंप्यूटर का उपयोग करते हैं, जिससे आंखों पर दबाव बढ़ सकता है।

विशेषज्ञ सामान्यतः सलाह देते हैं कि:

  • स्क्रीन के बीच-बीच में आंखों को आराम दिया जाए

  • बाहर खेलने का समय बढ़ाया जाए

  • पर्याप्त रोशनी में पढ़ाई की जाए

इन आदतों से आंखों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

क्या बाहर खेलना आंखों के लिए अच्छा माना जाता है?

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चों के लिए खुली जगह में समय बिताना आंखों के लिए फायदेमंद हो सकता है।

आजकल बहुत से बच्चे अपना अधिक समय घर के भीतर बिताते हैं। पढ़ाई और स्क्रीन के कारण आंखों पर लगातार दबाव बना रहता है।

बाहर खेलना केवल शरीर के लिए ही नहीं, आंखों के लिए भी अच्छा माना जाता है।

माता-पिता को किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?

यदि बच्चे को बार-बार ये समस्याएं हों:

  • टीवी के बहुत पास बैठना

  • आंखें मिचमिचाना

  • पढ़ते समय सिरदर्द

  • स्कूल में बोर्ड देखने में परेशानी

तो आंखों की जांच करवानी चाहिए।

कई बार बच्चे खुद अपनी परेशानी ठीक से बता नहीं पाते। इसलिए माता-पिता की सतर्कता महत्वपूर्ण होती है।

क्या कम उम्र में सर्जरी करवाना जोखिम बढ़ा सकता है?

यदि आंखों का नंबर स्थिर न हो और आंखें अभी विकसित हो रही हों, तो भविष्य में दृष्टि दोबारा बदल सकती है। यही कारण है कि डॉक्टर सामान्यतः इंतजार करने की सलाह देते हैं।

आंखों का स्वास्थ्य किसी भी त्वरित समाधान से अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

क्या बच्चे का नंबर हमेशा बढ़ता ही रहेगा?

हर बच्चे में स्थिति अलग होती है। कुछ बच्चों का नंबर एक उम्र के बाद स्थिर हो जाता है, जबकि कुछ में धीरे-धीरे बदलाव जारी रह सकता है।

नियमित जांच से स्थिति को समझने में मदद मिलती है।

सामान्य प्रश्न

क्या 15 या 16 वर्ष की उम्र में लेसिक हो सकती है?

आमतौर पर इतनी कम उम्र में लेसिक की सलाह नहीं दी जाती क्योंकि आंखों का नंबर स्थिर नहीं होता।

क्या चश्मा पहनने से नंबर बढ़ता है?

नहीं। सही नंबर का चश्मा दृष्टि सुधारने में मदद करता है।

क्या बच्चों के लिए लेंस सुरक्षित होते हैं?

कुछ बच्चों में डॉक्टर की सलाह से लेंस उपयोग किए जा सकते हैं, लेकिन साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है।

क्या बाहर खेलने से आंखों को फायदा होता है?

खुली जगह में समय बिताना आंखों के लिए लाभकारी माना जाता है।

निष्कर्ष

बच्चों में लेसिक सर्जरी सामान्यतः नहीं की जाती क्योंकि उनकी आंखें अभी विकसित हो रही होती हैं और नंबर स्थिर नहीं होता। ऐसे मामलों में जल्दबाजी के बजाय सही देखभाल, नियमित जांच और विशेषज्ञ की सलाह अधिक महत्वपूर्ण होती है।

माता-पिता के लिए सबसे जरूरी बात यह समझना है कि आंखों का स्वास्थ्य लंबे समय तक सुरक्षित रहना चाहिए। सही समय आने पर डॉक्टर ही तय करते हैं कि कोई सर्जरी उपयुक्त होगी या नहीं।

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